Tuesday, April 17, 2012

कमिश्नरी सिस्टम अब बिहार की जरूरत है।

बिहार का पुलिसिया सिस्टम आज बदलाव की मांग कर रहा है। एक ऐसे बदलाव की मांग जो स्ट्रेचर पर पड़ी बिहार पुलिस को पुनः अपने पैरों पर खड़ा कर सके। बिहार में अपराध पर यहां कि पुलिस को कोसने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जाती है लेकिन बात जब पुलिस को स्वतंत्रता यानि कि ज्यादा अधिकार देने की आती है तो सबके मुंह में ताले लग जाते हैं। कुछ का कहना है कि अगर पुलिस को ज्यादा छूट दे दी तो वह अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल करेगी। बिहार की पुलिस व्यवस्था को पंगु बनाने में सबसे बड़ा हाथ राजनीतिक पार्टियों का रहा है। चुनावों से पहले सभी पार्टियों ने बिहार में बढ़ रहे क्राइम ग्राफ पर चिंता जाहिर करते हुए कमिश्नरी सिस्टम लागू किए जाने की बात कही लेकिन सत्ता की चाबी हाथ में आते ही यह मुद्दा न जाने किस अंधेरे में गुम हो गया। सूबे के आईपीएस व बीपीएस अधिकारियों ने कई बार पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू करने के संबंध में आवाज़ उठायी लेकिन इसे यह कहकर खारिज कर दिया गया कि राज्य में वर्तमान पुलिस ढांचा अभी फ़िलहाल कमिश्नरी सिस्टम को अपनाने लायक नहीं है। पिछले कई सालों से राजनीतिक पार्टियां कमिश्नरी सिस्टम के मुद्दे को फुटबाल की तरह ठोकर मारती रहीं और यह मुद्दा सिर्फ इन पार्टियों के चुनावी मैनिफेस्टो का हिस्सा बनकर रह गया।



देश के एक अहम् राज्य बिहार में बिहार पुलिस 80,286 वर्ग कि.मी के क्षेत्र में न्याय एवं कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी है। ये पुलिस सेवा न केवल भारत बल्कि विश्व की बेहतरीन पुलिस सेवा है। जिसमें कई तरह के विभाग शामिल हैं। इतने अहम् राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने से लेकर किसी के घर के झगड़े तक को सुलझाने में पुलिस को अपनी भूमिका निभानी पड़ती है, ऐसे में इतनी बड़ी व्यवस्था को चलाने के लिए पुलिस के पास प्रयाप्त अधिकार नहीं है। शायद यही वजह है कि सूबे में अपराध दिन दूना रात चौगुना की गति से बढ़ रहा है लेकिन राज्य में आने जाने वाली सरकारों ने बिहार पुलिस को और स्वतंत्र बनाने को लेकर कोई पहल नहीं की। बिहार में तैनात आईपीएस अधिकारियों पर भी इसका असर देखने को मिला। कई आईपीएस अधिकारियों की मानें तो बिहार में अपराध पर लगाम कसने के लिए पुलिस को और अधिक स्वतंत्रता की ज़रूरत है। कई ऐसे कार्य होते हैं जिनको करने के लिए बिहार पुलिस के हाथ बंधे होते हैं और वह मजबूर होती है। जिसका सीधा असर उनके मनोबल भी पड़ता है। वर्तमान में बिहार पुलिस के सामने समस्याओं का अंबार है। ये ऐसी समस्याएं हैं जिनका जल्द से जल्द हल होना समाज के लिए हितकारी होगा। यहां के पुलिस अधिकारी वर्तमान में जिस प्रणाली के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं, उससे एक तो उनका मनोबल कम हो रहा है और मान-सम्मान को भी ठेस पहुंच रही है। वर्तमान में लागू एसएसपी सिस्टम में थानाध्यक्षों की पोस्टिंग में जिलाधिकारी का हस्तक्षेप भी पुलिस के लिए एक समस्या है। इससे जिले का पुलिस कप्तान कर्मठ पुलिस कर्मियों की थानों में तैनाती नहीं कर पाता है। जबकि पुलिस अगर कुछ गलत करती है तो जवाबदेही डीएम की न होकर पुलिस कप्तान की होती है।



बिहार में पुलिस अधिकारियों की दूसरी सबसे बड़ी समस्या प्रमोशन है। सूबे में परिणामी ज्येष्ठता प्रणाली लागू होने के बाद कई पुलिस अधिकारियों को काफी लंबे समय तक उनके मिलने वाले प्रमोशन से वंचित रखा गया। जबकि इस मामले में उच्च न्यायालय ने आदेश भी दे दिए हैं। राज्य सरकार द्वारा 2009 में बनाई गई परिणामी ज्येष्ठता सूची की नई नियमावली 8A ने बिहार पुलिस को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। इस नियमावली के तहत प्रमोशन को आरक्षण देने के लिए परिणामी ज्येष्ठता सूची जारी की गई। इस नियमावली ने आरक्षित वर्ग के अधिकारियों को प्रमोशन के मामले में अपने बैच में नंबर-1 की पोजीशन पर पहुंचा दिया। इस नियमावली के आने से पहले अधिकारियों की सीनियारिटी कमीशन के आधार पर तय होती थी, इसमें अगर किसी बैच में प्रमोशन के लिए 5 पद हैं तो पहले 4 जनरल और फिर एक आरक्षित वर्ग के अधिकारी को दिया जाता था लेकिन नियमावली 8A के आने के बाद यह सीनियारिटी परिणामी ज्येष्ठता सूची के आधार पर तय की जाने लगी। इस व्यवस्था ने प्रमोशन की प्रक्रिया पूरी तरह से पलट दिया। अब प्रमोशन में पहले आरक्षित वर्ग के अधिकारी को वरीयता दी जाएगी, इसके बाद जनरल वर्ग को। इस नियमावली का प्रभाव प्रांतीय पुलिस सेवा के वर्ष 82, 83 और 84 बैच तक तो कम नजर आया लेकिन इसके बाद 85 बैच से इस नियमावली की खामियां तेजी से सामने आने लगी और सूबे के पुलिसकर्मी अपने प्रमोशन को लेकर डिप्रेशन का शिकार होने लगे।



क्या होती है पुलिस कमिश्नर प्रणाली

एक अनुमान के मुताबिक राज्य की आधी आबादी को पुलिस कमिश्नरी सिस्टम के बारे में जानकारी ही नहीं है और न ही कभी किसी ने उन्हें यह समझाने की कोशिश की। दरअसल कमिश्नर प्रणाली की व्यवस्था के तहत पुलिस अधिकारियों को ज़्यादा अधिकार हासिल हो जाते हैं। जबकि वर्तमान व्यवस्था के तहत ज्यादा और व्यापक अधिकार मजिस्ट्रेटों के पास हैं। जिले में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए वर्तमान में पुलिस को प्रशासन के ड्यूटी मजिस्ट्रेट पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। भीड़ पर लाठीचार्ज करने, कहीं छापा मारने व कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को ड्यूटी मजिस्ट्रेट को साथ लेना पड़ता है लेकिन पुलिस कमिश्नरी बनने के बाद पुलिस के पास सीआरपीसी के तहत पुलिस को कई शक्तियां हासिल हो जाती हैं, जिससे पुलिस अधिकारियों की देखरेख में ही तुरंत लाठीचार्ज व अन्य कार्रवाइयों को अमल में लाया जा सकता है। इसी तरह शांति भंग करने वाले पर जुर्माना लगाना व आरोपी को जेल भेजने जैसी शक्तियां भी पुलिस को हासिल हो जाती हैं। फिलहाल मजिस्ट्रेट की पावर, 107, 51 और सीआरपीसी की धारा 144 की पावर, डीसी के पास होती है, परंतु कमिश्नरी प्रणाली में यह पावर पुलिस के पास आ जाती है। इसके अलावा हथियार के लाइसेंस की पावर भी पुलिस के पास आ सकती है।





कानून के जानकार मानते हैं कि बिहार में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू होना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि इस प्रक्रिया के लागू हो जाने के बाद पुलिस को कार्रवाई की छूट और निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिल जाएगी, जो कि वर्तमान में बिहार के आपराधिक ढांचे को देखते हुए नितांत आवश्यक है। वर्तमान में लागू एसएसपी सिस्टम में अधिकारियों को कार्रवाई की छूट न मिलने से गंभीर अपराधों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है और जनता सिवाय पुलिस को कोसने के कुछ नहीं करती। अगर बिहार में कमिश्नरी सिस्टम लागू हो जाए तो लॉ एंड ऑर्डर में सुधार हो सकता है, साथ पुलिस प्रशासन पर पड़ने वाला राजनीतिक दबाव पर भी लगाम लगेगी।



अभी हालही में देश के कई राज्यों में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू हुआ है। हरियाणा के अंबाला और फरीदाबाद में भी पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू किया गया। मध्य प्रदेश के भोपाल व इंदौर में भी कमिश्नरी प्रणाली लागू की गयी। कोलकाता में शुरू से ही कमिश्नरी सिस्टम लागू है। अगर बिहार और यूपी को छोड़ दें तो उत्तर भारत के लगभग हर राज्यों में कमिश्नरी सिस्टम लागू हो गया है लेकिन बिहार और यूपी इस व्यवस्था को अपनाने में न नुकर कर रहा है।