अब भोजपुरी फिल्मों में डाइरेक्टर बनने का रास्ता खुल गया । यानि सपना पूरा करना हुआ और भी आसान । अब किसी को भी निर्देशन (डाइरेक्शन) का कोर्स करने और टेक्निकल जानकारी लेने की फालतू में कोई जरूरत नहीं है । और ना ही फिजूल में समय और पैसे खर्च करने की जरूरत । अर्थात कोई भी बकलोल आदमी बस एक्शन और कट बोलना सीख ले । बस समझो हो गए डाइरेक्टर...साल में 20 - 30 लाख तो पक्का...चाहें तो इनकम में और भी इजाफा कर सकते हैं । गाड़ी - बंगला मुम्बई में या कहीं भी जमीन या फ्लैट अलग से...हर जगह अपने एजेंट फैलाइये..जो आपकी जयकारा लगा सके । फिर सभी टेक्नीशियनों आदि से सेटिंग करके कमीशन में कमाइए ।
जी हां..यकीन ना हो तो कुछ तथाकथित भोजपुरी फ़िल्म डाइरेक्टरों के नाम आप पता लगा सकते हैं । जो यह काम काफी समय से करते हुए काफी आगे तरक्की कर रहे हैं । अब हम आपको फ़िल्म बनाने का सर्वोत्तम तरीका बताते हैं । अपने टीम में बस होशियार और जानकार कैमरामैन, 2 असिस्टेंट, समझदार टेक्नीशियन पकड़ लीजिए । फ्री में कहानी और गाना लिखने वाला तथा कलाकार ढूंढिए । अगली 5 फिल्मों में काम देने का वादा कीजिए । अब महत्वपूर्ण बात...पार्टी यानि फाइनेंसर डील कीजिए । 50 लाख का सीधे 5 करोड़ रिटर्न होने का उनमें विश्वास पैदा कीजिए । उनको शराब और शबाब का भरपूर मजा मिलने का हवस दिखाइए । सर्वप्रथम फ़िल्म का आधा पैसा जेब में रखिए । फ़िल्म पूरी हो या न हो कोई बात नहीं । समझो काम हो गया । अरे भई, बुजुर्ग कह के गए हैं कि जब तक इस संसार में मूर्ख रहेंगे तब तक होशियार खाए बिना नहीं मरेगा । इस फार्मूले में ध्यान रहे कि इन लोगों से केवल आपको पैतरे बदल-बदल के बात करना है । ताकि उनको आप पर संदेह न हो । फ़िल्म रिलीजिंग के समय तो बाद में आप लोगों को "मेरे साथ धोखा हो गया" की बात कह के धीरे से बच भी सकते हैं । वैसे कभी भी आकस्मात आप पर हमला होने अथवा गाली सुनने का बुरा ना मानिए ..सजग रहिए...सावधान इंडिया की तरह । फिर दूसरे प्रोजेक्ट में लग जाइये । फिर समय कहाँ की आप पिछली किसी फिल्म को रिलीज करवाने के लिए ब्यर्थ समय गवायें । फाइनेंसर अथवा प्रोड्यूसर को किया झूठा वादा जाईये भूल...बस याद रखिए कि अगला कौन बनेगा अप्रैल फूल । अपना काम बनता तो फिर भाँड़ में जाये जनता । जय हो.......
Thursday, November 29, 2018
भोजपुरी फिल्मों में 100% रोजगार के सुनहरे अवसर, लाखों कमायें....जल्दी करें...मौका छूट न जाये..😉
Friday, August 3, 2018
40 lac illegal immigrants. अर्थात- 40 लाख अवैध अप्रवासी
40 lac illegal immigrants.
अर्थात- 40 लाख अवैध अप्रवासी
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कोई कहीं नही जाएगा... ध्यान दीजिएगा और ध्यान से पोस्ट पढिएगा 👇👇👇
हां तो 2 -3 दिन से तथाकथित हिन्दू जनता बहुत खुश हो रही थी खासकर अंध चमचे जो कि साहेब भक्ति को ही हिंदुत्व का नाम देते हैं 😀😀
तो आओ ज़रा नज़र उतार दूँ...😠😠
हां तो मित्रो एक घटना का स्मरण हो रहा है जैसा कि मैने पूर्व में पढ़ा था,
बात 1998 की है महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना सरकार की थी मुम्बई कोर्ट के अलग अलग आदेशों के अनुसार 96 लोग अवैध बांग्लादेशी इमिग्रेंट साबित हुए... राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को इस विषय मे सूचना डाल कर सभी अवैध प्रवासियों को कुर्ला एक्सप्रेस में एक डिब्बा रिज़र्व कर अपने सशस्त्र 14 पुलिस बल संख्या के साथ बांग्लादेश बॉर्डर के लिए रवाना कर दिया ताकि पुलिस देख रेख में इन्हें अपने देश बांग्लादेश वापिस भेजा जा सके .. परन्तु हावड़ा स्टेशन पहुंचने से पहले जिस स्टेशन पर गाड़ी रुकी वहां 900 हथियारबंद मुस्लिम शांतिदूत स्वागत के लिए तैयार खड़े थे... वहां उन्होंने सीधा उसी डिब्बे पर हमला किया जिसमे वो अवैध बांग्लादेशी deport करने के लिए ले जाये जा रहे थे.. 14 पुलिस वालों को अपनी सुरक्षा के लिए हवाई फायरिंग करनी पड़ी अगर रेलवे पुलिस बल उनको ना निकालता तो उनकी मृत्यु mob lynching के तहत तय ही थी.. यह सब CPI की सरकार के MP की देख रेख में हुआ 2, 4 दिन बाद उस MP हारून असलम ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि "बंगाली बोलने वालों को बांग्लादेशी करार देने वाली महाराष्ट्र सरकार निरीह मुसलमानों पर जुल्म कर रही है यह बर्बर सरकार है.. हालांकि सर्वविदित सत्य यह है कि महाराष्ट्र सरकार सिर्फ कोर्ट के आदेशों का पालन कर रही थी मज़े की बात है कि तत्कालीन वामपंथी सरकार के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने भी इन अवैध प्रवासियों के हक में बयान दिया.. 1980 से 1991 तक महाराष्ट्र सरकार ने 8113 बांग्लादेशियों को deport करने के लिए पश्चिमी बंगाल में भेजा पर बंगाल बॉर्डर पार करते ही उन्हें छुड़वा लिया गया .. कामरेडिओं का राज गया पर बंगाल में अवैध बांग्लादेशियों की संख्या इतनी है कि वो जो चाहें वही होगा क्योंकि यह संविधान नाम की बीमारी जो है... 😀
इसी संविधानिक कमज़ोरी को मोमता दीदी ने भुनाया.. मोमता दीदी का कोर वोटर भी अवैध बांग्लादेशी ही हैं इसीलिए आसाम से 40 लाख अवैध घोषित हुए बांग्लादेशियों के हक में नागिन बन फुंकार रही है..😜 अब उन अति उत्साहित भक्तजनों को कुछ कहना चाहता हूं यारों 40 लाख लोग जो 1975 से पहले की नागरिकता साबित नही कर पाए क्या उनका परिवार नही है..? 1975 से अब तक 44 साल बीत चुके हैं, जिस हिसाब से इन बेचारो की प्रजनन गति है उस हिसाब से तो 75 में जन्म लेने वाला कम से कम 5 बच्चे और 25 पोतों वाला तो होगा ही.. तो प्रश्न यह है कि अगर यह अवैध हैं तो इनको किधर भेजोगे...🤔🤔
भारत सरकार अगर यह कहेगी कि ये अवैध बांग्लादेशी या अवैध म्यांमार के नागरिक हैं तो क्या वहां की सरकारें मान लेंगी... और अगर ज़बरदस्ती से इन्हें सीमा के पास खड़ा कर दिया और उधर के देश की सरकार यह कह दे कि ये हमारे नही तो क्या कर लेगी भारत की सरकार..?
उधर इनको गोली मारने का आदेश होगा कि जो भी बॉर्डर क्रॉस करे उसे गोली मार दो.. और फिर क्यों भूल जाते हो कि ये जो 4 साढ़े 4 साल से बिना हड्डी के तड़फ रहे कुछ कुत्ते जो NGO, मीडिया वगैरह के छद्म रूप में हैं वो एक क्षण भी नही लगाएंगे वहां पहुंचने में और फिर अंतराष्ट्रीय दवाब, मानवाधिकार संगठन, जेनेवा समझौता कुल मिला कर 40 लाख औऱ उनकी औलादों को अगर वो देश ना लेना चाहें तो क्या कर लोगे...?? एक भी नही जाएगा, लिखवा लो आज ही ये सब वोट बैंक की राजनीति है ताकि लोगो का ध्यान उधर बंटा रहे, साहब के द्वारा किये गए अनगिनत वादों पर ध्यान ही ना जाए किसी का इसलिए एक शगूफा छोड़ दिया गया है कि लगे रहो बिना काम के काम मे ... 😀😀
हां तो साहब के अंध चमचो आपस में उलझने से कुछ नही होने वाला क्योकि सच्चाई यही है ... शान्ति बना के रहो, जियो और सबको जीने दो, साहब को उनके किये वादे याद दिलाओ 4.4 का हिसाब मांगो जानते हो क्यों क्योंकि पार्टियों में जब जनता का डर निकल जाता है तब ये निरंकुश हो जाती है और जनता महत्वहीन.. अपना महत्व बताओ इन पार्टियों को ...
जय श्री राम .... जय माँ भारती
Thursday, August 2, 2018
हमारा देश जल रहा है।
मेरे प्यारे देशवासियों,
हमारा देश जल रहा है। इसे बचा लीजिए। इस तमाशे में किसी का भला नहीं है। दंगों की कुछ वजहें होती हैं। उसने पहले फेंका तो उसने बाद में ये कहा। पुलिस उनकी मदद के लिए आई, हमारी मदद के लिए नहीं आई। कहीं गाय का मांस फेंकना तो कहीं सुअर का मांस फेंकना। यह सब तरीका पुराना हो चुका है। आप इन चक्करों में क्यों पड़ते हैं। कई ज़िलों व ज़िलों से रोज़ तनाव की ख़बरें आ रही हैं। इन नेताओं के चक्कर में अपना भाईचारा मत गंवाइये। ये आएंगे और जाएंगे मगर आपको अपने शहर में रहना है। निकलिए चौराहे पर, पड़ोसी का दरवाज़ा खटखटाइये। आवाज़ दीजिए कि आप दंगों की इस मानसिकता के ख़िलाफ़ है। आप हिन्दू हों या मुसलमान थाना पुलिस और मंदिर मस्जिद कर कहीं नहीं पहुंचेंगे। आपके बच्चों पर मुकदमे हो जाएंगे। पुलिस की किताब में घर घर में दंगों के आरोपी हो जाएंगे और आपके नकली गुस्से का लाभ उठाकर नेता ऐश करेगा। सावधान रहिए।
किसी ने कुछ किया भी है तो उसे माफ कर दीजिए। सत्ता फेल हो रही है। इन नेताओं पास आपसे किए गए वादों को लेकर आंखें मिलाने की लाज और हिम्मत नहीं बची है। वो नहीं आ सकते हैं, चीखते हुए कि देखो ये कहा था, वो कर दिया। उन्हें दंगों की लपटों से उठते धुएं का बहाना चाहिए ताकि उसकी आड़ में छिप कर आपका वोट ले जाएं। घर आपका जलेगा, ताज उनके सिर पर चमकेगा।
इसके ख़िलाफ़ या उसके ख़िलाफ़ आपके तर्क सही होंगे मगर आपसी बहस को नफ़रत में मत बदलने दीजिए। ख़ूब गिला शिकवा निकालिए मगर एक दूसरे के दुकानों को मत जलाइये। किसी पर पत्थर मत फेंकिए। किसी की जान मत लीजिए। आप देखिए आपके कॉलेजों की हालत क्या है। लाखों छात्रों का बीए नहीं हो रहा है, किसी को नौकरी नहीं मिल रही है और बहुत चालाकी से ये सभी नेता आपको हिन्दू मुसलमान में उलझा चुके हैं। आपको दंगाई बनाया जा रहा है। आप चाहे हिन्दू हों या मुसलमान हों। दंगाई बनने से रोकिए ख़ुद को। सारे मुकदमे वापस लीजिए और आपस मे गले मिल जाइये।
आप एक अच्छे नागरिक हैं। अब भी वक्त है कि अपने गुस्से से वापस लौट आने का, नफरत वहीं छोड़ कर गले मिलने का। नेता आपका घर जला रहा है तो आप कहां हैं। देश कहां हैं। आप लोग बाहर निकलिए। इस देश को बचा लीजिए। नेताओं को अब सशक्त वोटर नहीं चाहिए, उन्हें दंगों में उलझा हुआ वोटर चाहिए जो उनसे वादों का हिसाब न पूछे बल्कि अपनी किसी अनजाने डर से खुद को सुरक्षित करने के लिए उनपर निर्भर हो जाए। उम्मीद है आप खुद को समझाने का एक मौका देंगे। ख़ुद को दंगाई बनाने का कोई मौक़ा नहीं देंगे।
आपका अपना
शुभचिंतक ... 🙏
Wednesday, August 1, 2018
The Forgotten daughter of Rajasthan
The Forgotten daughter of Rajasthan, An inspiring story of 26/11 Mumbai terror attack witness Devika Rotawan
On the night of 26th November 2008, few terrorists entered Mumbai city through the seas and started randomly firing at innocent people. Many people were shot dead and several others suffered severe injuries. One such girl was Devika Rotawan who was caught in the terrorist firing.
Devika Rotawan”s tale is an inspiring story of The forgotten Rajasthan ki Beti who identified the terrorist Ajmal Kasab in court. 9-year-old Devika was waiting for a train at CST station with her family when she was shot in the legs by Ajmal Kasab on the dreaded night of 26 November and suffered severe injuries.
She was hospitalized and later Mumbai Police managed to capture Kasab alive. But, they could not find any witnesses who were ready to identify him in court. In India, witnesses in judicial trials face a lot of hardships like social boycott, ridicule and mocking by friends, etc. Later, the police approached her father and also Devika to become an eyewitness in the trial. She was only 10 years old.
She immediately agreed. During the trial, she came to court on her crutches and identified Ajmal Kasab as the terrorist who shot people which led to his conviction. However, instead of saluting and admiring the courage and bravery shown by this 10-year-old, her own village members boycotted her and her family. She was given names like Kasab ki Beti by her neighbors. She struggled immensely in her academics as no school was willing to give admission to an eyewitness. Her father faced a lot of hardships in his business as nobody was ready to talk to him fearing attacks by terrorists. He shut down his business. Her brother who was taking care of her in the hospital was asked by hospital authorities to treat other patients without any proper gear. He developed an infection in his spinal cord and now his body shape is deformed. He is not able to lift heavy weights. They left their village and the family came to Mumbai searching for work. Her troubles did not end as her mother passed away in 2006 and now she is also fighting TB. They were promised a permanent flat by the government but they are living on rent. Her dream is to become an IPS officer and end terrorism.
Just 2–3 days back, Rajasthan based NGO Tapovan has come forward and offered financial aid for her studies. They have also offered them a home in Rajasthan”s Ganganagar.
Friday, May 18, 2018
ब्राह्मण एक अभिशाप
क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत है?
यह पोस्ट किसी जाति के लिए नहीं वरन ब्राह्मणों के विरुद्ध समाज में फैलाई जा रही नकारात्मकता के बारे में है-
जिन लोगों ने भारत को लूटा, तोडा, नष्ट किया, वे आज इस देश में ‘अतीत भुला दो’ के नाम पर सम्मानित हैं और एक अच्छा जीवन जी रहे हैं। जिन्होंने भारत की मर्यादा को खंडित किया, उसके विश्विद्यालयों को विध्वंस किया, उसके विश्वज्ञान के भंडार पुस्तकालयों को जला कर राख किया, उन्हें आज के भारत में सब सुविधाओं से युक्त सुखी जीवन मिल रहा है। किंतु वे ब्राह्मण जिन्होंने सदैव अपना जीवन देश, धर्म और समाज की उन्नति के लिए अर्पित किया, वे आधुनिक भारत में "काल्पनिक" पुराने पापों के लिए दोषी हैं।
आधुनिक इतिहासकार हमें सिखाते हैं कि भारत के ब्राह्मण सदा से दलितों का शोषण करते आये हैं जो घृणित वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक भी हैं। ब्राह्मण-विरोध का यह काम पिछले दो शतकों में कार्यान्वित किया गया।
वे कहते हैं कि ब्राह्मणों ने कभी किसी अन्य जाति के लोगों को पढने लिखने का अवसर नहीं दिया। बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के बड़े बड़े शोधकर्ता यह सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि ब्राह्मण सदा से समाज का शोषण करते आये हैं और आज भी कर रहे हैं, कि उन्होंने हिन्दू ग्रन्थों की रचना केवल इसीलिए की कि वे समाज में अपना स्थान सबसे ऊपर घोषित कर सकें...किंतु यह सारे तर्क खोखले और बेमानी हैं, इनके पीछे एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं। एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह अंततः सत्य प्रतीत होने लगता, इसी भांति इस झूठ को भी आधुनिक भारत में सत्य का स्थान मिल चुका है।
आइये आज हम बिना किसी पूर्व प्रभाव के और बिना किसी पक्षपात के न्याय बुद्धि से इसके बारे सोचे, सत्य घटनायों पर टिके हुए सत्य को देखें। क्योंकि अपने विचार हमें सत्य के आधार पर ही खड़े करने चाहियें, न कि किसी दूसरे के कहने मात्र से। खुले दिमाग से सोचने से आप पायेंगे कि ९५ % ब्राह्मण सरल हैं, सज्जन हैं, निर्दोष हैं। आश्चर्य है कि कैसे समय के साथ साथ काल्पनिक कहानियाँ भी सत्य का रूप धारण कर लेती हैं। यह जानने के लिए बहुत अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं कि ब्राह्मण-विरोधी यह विचारधारा विधर्मी घुसपैठियों, साम्राज्यवादियों, ईसाई मिशनरियों और बेईमान नेताओं के द्वारा बनाई गयी और आरोपित की गयी,ताकि वे भारत के समाज के टुकड़े टुकड़े करके उसे आराम से लूट सकें।
सच तो यह है कि इतिहास के किसी भी काल में ब्राह्मण न तो धनवान थे और न ही शक्तिशाली। ब्राह्मण भारत के समुराई नहीं है। वन का प्रत्येक जन्तु मृग का शिकार करना चाहता है, उसे खा जाना चाहता है, और भारत का ब्राह्मण वह मृग है। आज के ब्राह्मण की वह स्थिति है जो कि नाजियों के राज्य में यहूदियों की थी। क्या यह स्थिति स्वीकार्य है? ब्राह्मणों की इस दुर्दशा से किसी को भी सरोकार नहीं, जो राजनीतिक दल हिन्दू समर्थक माने गए हैं, उन्हें भी नहीं;सब ने हम ब्राह्मणों के साथ सिर्फ छलावा ही किया है।ब्राह्मण सदा से निर्धन वर्ग में रहे हैं! क्या आप ऐसा एक भी उदाहरण दे सकते हैं जब ब्राह्मणों ने पूरे भारत पर शासन किया हो?? शुंग,कण्व ,सातवाहन आदि द्वारा किया गया शासन सभी विजातियों और विधर्मियों को क्यूं कचोटता है? *चाणक्य* ने *चन्द्रगुप्त मौर्य* की सहायता की थी एक अखण्ड भारत की स्थापना करने में। भारत का सम्राट बनने के बाद, चन्द्रगुप्त ,चाणक्य के चरणों में गिर गया और उसने उसे अपना राजगुरु बनकर महलों की सुविधाएँ भोगते हुए, अपने पास बने रहने को कहा। चाणक्य का उत्तर था: ‘मैं तो ब्राह्मण हूँ, मेरा कर्म है शिष्यों को शिक्षा देना और भिक्षा से जीवनयापन करना। क्या आप किसी भी इतिहास अथवा पुराण में धनवान ब्राह्मण का एक भी उदाहरण बता सकते हैं?
श्री कृष्ण की कथा में भी निर्धन ब्राह्मण सुदामा ही प्रसिद्ध है।
संयोगवश, *श्रीकृष्ण* जो कि भारत के सबसे प्रिय आराध्य देव हैं, यादवंशी क्षत्रिय थे,
यदि ब्राह्मण वैसे ही घमंडी थे जैसे कि उन्हें बताया जाता है, तो यह कैसे सम्भव है कि उन्होंने अपने से नीची जातियों के व्यक्तियों को भगवान् की उपाधि दी और उनकी अर्चना पूजा की स्वीकृति भी?(उस सन्दर्भ में यदि ईश्वर ब्राह्मण की कृति हैं जैसा की कुछ मूर्ख कहते हैं) देवों के देव *महादेव शिव* को पुराणों के अनुसार *किराट जाति* का कहा गया है, जो कि आधुनिक व्यवस्था में *ST* की श्रेणी में पाए जाते हैं
दूसरों का शोषण करने के लिए शक्तिशाली स्थान की, अधिकार-सम्पन्न पदवी की आवश्यकता होती है। जबकि ब्राह्मणों का काम रहा है या तो मन्दिरों में पुजारी का और या धार्मिक कार्य में पुरोहित का और या एक वेतनहीन गुरु(अध्यापक) का। उनके धनार्जन का एकमात्र साधन रहा है भिक्षाटन। क्या ये सब बहुत ऊंची पदवियां हैं? इन स्थानों पर रहते हुए वे कैसे दूसरे वर्गों का शोषण करने में समर्थ हो सकते हैं? एक और शब्द जो हर कथा कहानी की पुस्तक में पाया जाता है वह है - ‘निर्धन ब्राह्मण' जो कि उनका एक गुण माना गया है। समाज में सबसे माननीय स्थान संन्यासी ब्राह्मणों का था, और उनके जीवनयापन का साधन भिक्षा ही थी। (कुछ विक्षेप अवश्य हो सकते हैं, किंतु हम यहाँ साधारण ब्राह्मण की बात कर रहे हैं।)
ब्राह्मणों से यही अपेक्षा की जाती रही कि वे अपनी जरूरतें कम से कम रखें और अपना जीवन ज्ञान की आराधना में अर्पित करें। इस बारे में एक अमरीकी लेखक *आलविन टाफलर* ने भी कहा है कि ‘हिंदुत्व में निर्धनता को एक शील माना गया है।’
सत्य तो यह है कि शोषण वही कर सकता है जो समृद्ध हो और जिसके पास अधिकार हों अब्राह्मण को पढने से किसी ने नहीं रोका। श्रीकृष्ण यदुवंशी थे, उनकी शिक्षा गुरु संदीपनी के आश्रम में हुई, श्रीराम क्षत्रिय थे उनकी शिक्षा पहले ऋषि वशिष्ठ के यहाँ और फिर ऋषि विश्वामित्र के पास हुई। बल्कि ब्राह्मण का तो काम ही था सबको शिक्षा प्रदान करना। हां यह अवश्य है कि दिन-रात अध्ययन व अभ्यास के कारण, वे सबसे अधिक ज्ञानी माने गए, और ज्ञानी होने के कारण प्रभावशाली और आदरणीय भी। इसके कारण कुछ अन्य वर्ग उनसे जलने लगे, किंतु इसमें भी उनका क्या दोष यदि विद्या केवल ब्राह्मणों की पूंजी रही होती तो वाल्मीकि जी रामायण कैसे लिखते और तिरुवलुवर तिरुकुरल कैसे लिखते?
और अब्राह्मण संतो द्वारा रचित इतना सारा भक्ति-साहित्य कहाँ से आता? जिन ऋषि व्यास ने महाभारत की रचना की वे भी एक मछुआरन माँ के पुत्र थे। इन सब उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि ब्राह्मणों ने कभी भी विद्या देने से मना नहीं किया।
जिनकी शिक्षायें हिन्दू धर्म में सर्वोच्च मानी गयी हैं, उनके नाम और जाति यदि देखी जाए, तो *वशिष्ठ, वाल्मीकि, कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर, कबीरदास, विवेकानंद* आदि, इनमें कोई भी ब्राह्मण नहीं। तो फिर ब्राह्मणों के ज्ञान और विद्या पर एकाधिकार का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता! यह केवल एक झूठी भ्रान्ति है जिसे गलत तत्वों ने अपने फायदे के लिए फैलाया, और इतना फैलाया कि सब इसे सत्य मानने लगे।पुरातन काल में जब कभी भी उन पर कोई विपदा आई, उन्होंने शस्त्र नहीं उठाया, क्षत्रियों से सहायता माँगी।
बेचारे असहाय ब्राह्मणों को अरब आक्रमणकारियों ने काट डाला, उन्हें गोवा में पुर्तगालियों ने cross पर चढ़ा कर मारा, उन्हें अंग्रेज missionary लोगों ने बदनाम किया, और आज अपने ही भाई-बंधु उनके शील और चरित्र पर कीचड उछल रहे हैं। इस सब पर भी क्या कहीं कोई प्रतिक्रिया दिखाई दी, क्या वे लड़े, क्या उन्होंने आन्दोलन किया?
औरंगजेब ने बनारस, गंगाघाट और हरिद्वार में १५०,००० ब्राह्मणों और उनके परिवारों की ह्त्या करवाई, उसने हिन्दू ब्राह्मणों और उनके बच्चों के शीश-मुंडो की इतनी ऊंची मीनार खडी की जो कि दस मील से दिखाई देती थी, उसने उनके जनेयुओं के ढेर लगा कर उनकी आग से अपने हाथ सेके। किसलिए, क्योंकि उन्होंने अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम को अपनाने से मना किया। यह सब उसके इतिहास में दर्ज़ है।
क्या ब्राह्मणों ने शस्त्र उठाया? फिर भी ओरंगजेब के वंशज हमें भाई मालूम होते हैं और ब्राह्मण देश के दुश्मन?
यह कैसा तर्क है, कैसा सत्य है?
कोंकण-गोवा में पुर्तगाल के वहशी आक्रमणकारियों ने निर्दयता से लाखों कोंकणी ब्राह्मणों की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने ईसाई धर्म को मानने से इनकार किया। क्या आप एक भी ऐसा उदाहरण दे सकते हो कि किसी कोंकणी ब्राह्मण ने किसी पुर्तगाली की हत्या की? फिर भी पुर्तगाल और अन्य यूरोप के देश हमें सभ्य और अनुकरणीय लगते हैं और ब्राह्मण तुच्छ! यह कैसा सत्य है?
जब पुर्तगाली भारत आये, तब *St. Xavier* ने पुर्तगाल के राजा को पत्र लिखा “यदि ये ब्राह्मण न होते तो सारे स्थानीय जंगलियों को हम आसानी से अपने धर्म में परिवर्तित कर सकते थे।” यानि कि ब्राह्मण ही वे वर्ग थे जो कि धर्म परिवर्तन के मार्ग में बलि चढ़े। जिन्होंने ने अपना धर्म छोड़ने की अपेक्षा मर जाना बेहतर समझा। *St. Xavier* को ब्राह्मणों से असीम घृणा थी, क्योंकि वे उसके रास्ते का काँटा थे,
हजारों की संख्या में गौड़ सारस्वत कोंकणी ब्राह्मण उसके अत्याचारों से तंग हो कर गोवा छोड़ गए, अपना सब कुछ गंवा कर। क्या किसी एक ने भी मुड़ कर वार किया? फिर भी *St. Xavier* के नाम पर आज भारत के हर नगर में स्कूल और कॉलेज है और भारतीय अपने बच्चों को वहां पढ़ाने में गर्व अनुभव करते हैं।
इनके अतिरिक्त कई हज़ार सारस्वत ब्राह्मण काश्मीर और गांधार के प्रदेशों में विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों मारे गए। आज ये प्रदेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान कहलाते हैं, और वहां एक भी सारस्वत ब्राह्मण नहीं बचा है। क्या कोई एक घटना बता सकते हैं कि इन प्रदेशों में किसी ब्राह्मण ने किसी विदेशी की हत्या की? हत्या की छोडिये, क्या कोई भी हिंसा का काम किया?
और आधुनिक समय में भी इस्लामिक आतंकवादियों ने काश्मीर घाटी के मूल निवासी ब्राह्मणों को विवश करके काश्मीर से बाहर निकाल दिया। ५००,००० काश्मीरी पंडित अपना घर छोड़ कर बेघर हो गए, देश के अन्य भागों में शरणार्थी हो गये, और उनमे से ५०,००० तो आज भी जम्मू और दिल्ली के बहुत ही अल्प सुविधायों वाले अवसनीय तम्बुओं में रह रहे हैं। आतंकियों ने अनगनित ब्राह्मण पुरुषों को मार डाला और उनकी स्त्रियों का शील भंग किया। क्या एक भी पंडित ने शस्त्र उठाया, क्या एक भी आतंकवादी की ह्त्या की? फिर भी आज ब्राह्मण शोषण और अत्याचार का पर्याय माना जाता है और मुसलमान आतंकवादी वह भटका हुआ इंसान जिसे क्षमा करना हम अपना धर्म समझते हैं। यह कैसा तर्क है?
माननीय भीमराव अंबेडकर जो कि भारत के संविधान के तथाकथित रचियता (प्रारूप समिति के अध्यक्ष) थे, उन्होंने एक मुसलमान इतिहासकार का सन्दर्भ देकर लिखा है कि धर्म के नशे में पहला काम जो पहले अरब घुसपैठिया मोहम्मद बिन कासिम ने किया, वो था ब्राह्मणों का खतना। “किंतु उनके मना करने पर उसने सत्रह वर्ष से अधिक आयु के सभी को मौत के घाट उतार दिया।” मुग़ल काल के प्रत्येक घुसपैठ, प्रत्येक आक्रमण और प्रत्येक धर्म-परिवर्तन में लाखों की संख्या में धर्म-प्रेमी ब्राह्मण मार दिए गए। क्या आप एक भी ऐसी घटना बता सकते हो जिसमें किसी ब्राह्मण ने किसी दूसरे सम्प्रदाय के लोगों की हत्या की हो?
१९वीं सदी में मेलकोट में दिवाली के दिन टीपू सुलतान की सेना ने चढाई कर दी और वहां के ८०० नागरिकों को मार डाला जो कि अधिकतर मंडयम आयंगर थे। वे सब संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे। (आज तक मेलकोट में दिवाली नहीं मनाई जाती।) इस हत्याकाण्ड के कारण यह नगर एक श्मशान बन गया। ये अहिंसावादी ब्राह्मण पूर्ण रूप से शाकाहारी थे, और सात्विक भोजन खाते थे जिसके कारण उनकी वृतियां भी सात्विक थीं और वे किसी के प्रति हिंसा के विषय में सोच भी नहीं सकते थे। उन्होंने तो अपना बचाव तक नहीं किया। फिर भी आज इस देश में टीपू सुलतान की मान्यता है।फिर भी आज इस देश में टीपू सुलतान की मान्यता है। उसकी वीरता के किस्से कहे-सुने जाते हैं। और उन ब्राह्मणों को कोई स्मरण नहीं करता जो धर्म के कारण मौत के मुंह में चुपचाप चले गए।
अब जानते हैं आज के ब्राह्मणों की स्थिति क्या आप जानते हैं कि बनारस के अधिकाँश रिक्शा वाले ब्राह्मण हैं? क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के रेलवे स्टेशन
पर आपको ब्राह्मण कुली का काम करते हुए मिलेंगे?
दिल्ली में पटेलनगर के क्षेत्र में 50 % रिक्शा वाले ब्राह्मण समुदाय के हैं। आंध्र प्रदेश में ७५ % रसोइये और घर की नौकरानियां ब्राह्मण हैं। इसी प्रकार देश के दुसरे भागों में भी ब्राह्मणों की ऐसी ही दुर्गति है, इसमें कोई शंका नहीं। गरीबी-रेखा से नीचे बसर करने वाले ब्राह्मणों का आंकड़ा ६०% है।
हजारों की संख्या में ब्राह्मण युवक अमरीका आदि पाश्चात्य देशों में जाकर बसने लगे हैं क्योंकि उन्हें वहां software engineer या scientist का काम मिल जाता है। सदियों से जिस समुदाय के सदस्य अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण समाज के शिक्षक और शोधकर्ता रहे हैं, उनके लिए आज ये सब कर पाना कोई बड़ी बात नहीं। फिर भारत सरकार को उनके सामर्थ्य की आवश्यकता क्यों नहीं ? क्यों भारत में तीव्र मति की अपेक्षा मंद मति को प्राथमिकता दी जा रही है? और ऐसे में देश का विकास होगा तो कैसे?
कर्नाटक प्रदेश के सरकारी आंकड़ों के अनुसार वहां के
वासियों का आर्थिक चित्रण कुछ ऐसा है: ईसाई भारतीय - १५६२ रू/ वोक्कालिग जन - ९१४ रू/ मुसलमान - ७९४ रू/ पिछड़ी जातियों के जन - ६८० रू/ पिछड़ी जनजातियों के जन - ५७७ रू/ और ब्राह्मण - ५३७ रू। तमिलनाडु में रंगनाथस्वामी मन्दिर के पुजारी का मासिक वेतन ३०० रू और रोज का एक कटोरी चावल है। जबकि उसी मन्दिर के सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम से कम २५०० रू है। ये सब ठोस तथ्य हैं लेकिन इन सब तथ्यों के होते हुए, आम आदमी की यही धारणा है कि पुजारी ‘धनवान’ और ‘शोषणकर्ता’ है, क्योंकि देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने अनेक वर्षों तक इसी असत्य को अनेक प्रकार से चिल्ला चिल्ला कर सुनाया है।
क्या हमने उन विदेशी घुसपैठियों को क्षमा नहीं
किया जिन्होंने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की हत्या की और देश को हर प्रकार से लूटा? जिनके आने से पूर्व भारत संसार का सबसे धनवान देश था और जिनके आने के बाद आज भारत पिछड़ा हुआ third world country कहलाता है। इनके दोष भूलना सम्भव है तो अहिंसावादी, ज्ञानमूर्ति, धर्मधारी ब्राह्मणों को किस बात का दोष लगते हो कब तक उन्हें दोष देते जाओगे?
क्या हम भूल गए कि वे ब्राह्मण समुदाय ही था जिसके कारण हमारे देश का बच्चा बच्चा गुरुकुल में बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा पाकर एक योग्य नागरिक बनता था? क्या हम भूल गए कि ब्राह्मण ही थे जो ऋषि मुनि कहलाते थे, जिन्होंने विज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर रखा था?
भारत के स्वर्णिम युग में ब्राह्मण को यथोचित सम्मान दिया जाता था और उसी से सामाज में व्यवस्था भी ठीक रहती थी। सदा से विश्व भर में जिन जिन क्षेत्रों में भारत का नाम सर्वोपरी रहा है और आज भी है वे सब ब्राह्मणों की ही देन हैं, जैसे कि अध्यात्म, योग, प्राणायाम, आयुर्वेद आदि। यदि ब्राह्मण जरा भी स्वार्थी होते तो यह सब अपने था अपने कुल के लिए ही रखते दुनिया में मुफ्त बांटने की बजाए इन की कीमत वसूलते। वेद-पुराणों के ज्ञान-विज्ञान को अपने मस्तक में धारने वाले व्यक्ति ही ब्राह्मण कहे गए और आज उनके ये सब योगदान भूल कर हम उन्हें दोष देने में लगे है।
जिस ब्राह्मण ने हमें मन्त्र दिया *‘वसुधैव कुटुंबकं’* वह
ब्राह्मण विभाजनवादी कैसे हो सकता है? जिस ब्राह्मण ने कहा *‘लोको सकलो सुखिनो भवन्तु'* वह किसी को दुःख कैसे पहुंचा सकता है? जो केवल अपनी नहीं , केवल परिवार, जाति, प्रांत या देश की नहीं बल्कि सकल जगत की मंगलकामना करने का उपदेश देता है, वह ब्राह्मण स्वार्थी कैसे हो सकता है?
इन सब प्रश्नों को साफ़ मन से, बिना पक्षपात के विचारने की आवश्यकता है, तभी हम सही उत्तर जान पायेंगे।
आज के युग में ब्राह्मण होना एक दुधारी तलवार पर चलने के समान है। यदि ब्राह्मण अयोग्य है और कुछ अच्छा कर नहीं पाता तो लोग कहते हैं कि देखो हम तो पहले ही जानते थे कि इसे इसके पुरखों के कुकर्मों का फल मिल रहा है। यदि कोई सफलता पाता है तो कहते हैं कि इनके तो सभी हमेशा से ऊंची पदवी पर बैठे हैं, इन्हें किसी प्रकार की सहायता की क्या आवश्यकता? अगर किसी ब्राह्मण से कोई अपराध हो जाए फिर तो कहने ही क्या, सब आगे पीछे के सामाजिक पतन का दोष उनके सिर पर मढने का मौका सबको मिल जाता है। कोई श्रीकांत दीक्षित भूख से मर जाता है तो कहते हैं कि बीमारी से मरा। और ब्राह्मण बेचारा इतने दशकों से अपने अपराधों की व्याख्या सुन सुन कर ग्लानि से इतना झुक चूका है कि बस चुपचाप सुनता है और अपने प्रारब्ध को स्वीकार करता है।
बिना दोष के भी दोषी बना घूमता है आज का ब्राह्मण। नेताओं के स्वार्थ, समाज के आरोपों, और देशद्रोही ताकतों के षड्यंत्र का शिकार हो कर रह गया है ब्राह्मण। बहुत से ब्राह्मण अपने पूर्वजों के व्यवसाय को छोड़ चुके हैं आज। बहुत से तो संस्कारों को भी भूल चुके हैं । अतीत से कट चुके हैं किंतु वर्तमान से उनको जोड़ने वाला कोई नही।
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